:امام صادق عليه السلام
اَقْرَبُ ما يَكُونُ الْعِبادُ اِلَى اللّهِ عَزَّوَجَلَّ وَاَرْضى ما يَكُونُ عَنْهُمْ، اِذَا افْتَقَدُوا حُجَّةَ اللّهِ، فَلَمْ يَظْهَرْ لَهُمْ، وَلَمْ يَعْلَمُوا بِمَكانِهِ، وَهُمْ فى ذلِكَ يَعْلَمُونَ اَنَّهَ لَمْ تَبْطُلْ حُجَّةُ اللّهِ، فَعِنْدَها فَتَوَقَّعُوا الْفَرَجَ كُلَّ صَباحٍ وَ مَسآءٍ؛ [بحارالأنوار: ج 52 ، ص 145]
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अलैहिस्सलाम) फ़रमाते हैं:
अल्लाह के बंदों की सबसे क़रीबी हालत अल्लाह के नज़दीक और उसकी सबसे ज़्यादा ख़ुशी का वह समय होता है, जब अल्लाह की हुज्जत (इमाम) लोगों के बीच मौजूद तो हों, लेकिन लोगों को दिखाई न दें और उन्हें उनके ठिकाने का पता भी न हो।
इसके बावजूद लोग इस बात पर पूरा यक़ीन रखते हों कि अल्लाह की हुज्जत (इमाम) मौजूद हैं।
ऐसे समय में लोगों को चाहिए कि वे रात-दिन इमाम के ज़हूर और फ़रज (मुश्किलों के दूर होने) का इंतज़ार करते रहें।
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